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सपनों को स्थगित करना

1902 में जन्में महान अमेरिकी अश्वेत लेखक लैंग्स्टन ह्यूज़ की लगभग लोकगीत बन चुकी कविता हार्लेम (Harlem) पढ़ने के बाद -

सपनों को स्थगित करना
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सपनों को स्थगित करना
होता है पुरानी चोट जैसा
ठीक न होने की निराशा में
जिसे जानबूझकर
भूल जाना चाहते हैं
यह सुबह का भूलना
शाम को लौटना होता है
भूलने और याद करने की
कश्मकश में सपने
पेंडुलम बने रहते हैं
सपनों को स्थगित करना
किसी रात भूखे पेट
सोने जैसा होता है
कई बार सिगरेट के
अमल जैसा कुछ
बस पा लेने का मन करता है
लेकिन हर बार दिमाग
चाहत के आवेग को
सुला देता है थपकी देकर
सपनों को स्थगित करना
कई बार जीने की इच्छाओं को
स्थगित करना भी होता है
सपने स्थगित करते करते
हम अपने आप से कितनी दूर
खिसक गए हैं ...नापना मु्श्किल है

देश और देशभक्ति के बीच

सामने हुए विभत्स
कत्ल को देखकर
नहीं कर सका कोई प्रतिरोध
चीखना चाहता था
लेकिन आवाज
अटक गई गले में कहीं
क्योंकि देश के नाम पर
की गई थी वो हत्याएं
और देशद्रोह सोचकर ही
कांप गई रूह मेरी


देश और देश भक्ति
पढने में भले हों महज दो शब्द
पर ये विचारों कर देते हैं 
ब्लैक एंड ह्वाइट
देश क्या है
देश में क्या क्या आता है
नहीं समझ पाया आज तक
लेकिन  डर लगता है  देशद्रोही होने से जैसे बचपन में लगता था  अब भी लगता है
घर के पास वाले तलाब से
उससे निकलने वाले भूतों से

बचपन में ही
रोप दिया गया था
देशद्रोह के भय का बीज
जो बन गया है अब बड़ा पेड़  इसकी छाया 
छीन लेती है गलत के खिलाफ  खड़े होने की शक्ति 
देश भक्ति और देश द्रोह
हत्यारों के लिए
ऐसे ही है
जैसे गुड़ के रस में
घोड़े को रम पिलाना 

देशभक्ति और देशद्रोह के बीच
खिंची है ऐसी अदृश्य रेखा
जो सोख लेती है
मानवता के सारे रंग, सारे रस
सिर्फ छोड़ती है
बंजर और शुष्क जमीन


दो प्रेम कविताएं ...

1
नहीं कहता तुम्हें मैं
गुलाब कली
भोर का तारा
या सांझ की लालिमा
तो कारण नहीं
कि दिल सूना है
या मेरा प्यार है धुंधला
बस केवल यही है :सारे उपमान
पड़ चुके हैं धुंधले
जैसे कपड़े घिस-घिस कर
छोड़ देते हैं रंग


मगर क्या तुम
नहीं पहचान पाओगे
अगर कहूं तुम्हें,
कास के फूल जैसा
या शरद की सुबह में
लहराती छरहरी
बजरे की बाली

सभ्यता के इस दौर में
जुही के फूल को भले ही
समझा जाता हो,
सौंदर्य का पैमाना
पर इससे अधिक
सच्चे- प्यारे प्रतीक हैं
कास के फूल
या शरद की सूनी सांझ
में डोलती बजरे बाली
(कुछ अधूरी लाइनें)
2

तुम्हें याद है,
जब हम मिले थे
आखिरी बार
तुम पलट कर
मुस्कराए थे
और मैनें बड़ी सफाई से
गीली आंखें छिपा ली थी
उसके ठीक पहले
हंसे थे हम दोनों
आखिरी बार एक साथ
वह हंसी उठी थी
नाभि के हिस्से से
और निकल गूंज गई
हमारे साथ हंसी थी सड़कें
और फुटपाथ भी
पर वे हंस रहे थे
हमारी नियति पर
उन्हें भी पता था
कि इन बावरों की हंसी
बस आज भर है
तुम्हें याद है या भूल गए
भूल गए हो तो अच्छा ही है
जरूरी नहीं दोनों उस
हंसीन मौसम के
इंतजार में कर दें
उम्र तमाम
तुम हंसो
मैं रोने का तुम्हारा औसत भी
पूरा करता हूं
(अधूरी लाइनें .)


पेंसिल, कलम, गुलाब वाले बच्चे

'क' से कलम नहीं जानता वह  'प' से पेंसिल मायने नहीं समझता शायद गुलाब जैसा वह खुद रहा होगा कभी शायद जन्म लेने के वक्त  या कुछ महीनों बाद तक  पर अब सूखकर कांटे जैसा हो गया है उसने स्कूल भी नहीं देखा कभी लेकिन पढ़ रहा है भूख का अर्थशास्त्र कल देखा उसे पेंसिल और गुलाब बेंचते हुए पिचके पेट, पड़पड़ाए होठ, सूखी शक्ल लिए एक-एक रुपए खातिर गिड़गिड़ाते हुए कोई पहली दफ़ा नहीं हर रोज देखा जाता है वह मेट्रो के नीचे, चौराहों पर कभी पेन कभी गुलाब लिए हाथों को लोगों से रिरियाते झिड़की खाते हुए मुझे डर लगता है पेंसिल, कलम, गुलाब वाले उन बच्चों से उनकी पेंसिल की नुकीली नोक आत्मा को बींधती है गुलाब के कांटे निकल चुभ जाते हैं पोर पोर में उनसे बचने का कोई रास्ता नज़र नहीं आता वे दिखने लगे हैं नीद में भी सुबकते हुए मैं रोज़ मनाता हूं ये खुदा ! सामना न हो इन पेंसिल कलम गुलाब वाले बच्चों से पर न तो खुद सुनता है और न बच्चे

खाली प्लेट जैसा

हर नया दिन होता है खाली प्लेट जैसा जिसमें दिखता है उदास, धुंधला खुद का अक्स   परोसता हूं उसपर दाल भात दाल में कभी नमक ज्यादा कभी हल्दी
दोनो को साधने की कोशिश
रोज होती है, हो रही है
जैसे मेड़ पर चलाना साइकिल कर देता हूं एक एक चावल बीन,
जीभ से चाट प्लेट  पहले से अधिक चमाचम
लेकिन यह चमक तब तक है,
जब तक उसमें,
दाल-भात की नमी बनाता हूं अंगुलियों से
मन के खुरापातों की
तस्वीर प्लेट पर,
रोज की तरह
तब तक फिसल कर,
हाथ से गिर गई प्लेट
छन्न की आवाज करके,
जैसे दिन बीत जाता है धीरे से
बाद फिर मचती है हाय-तौबा

हम वहीं खड़े हैं

मसरूफियत के जिस चौराहे पर खड़े हो तुम उसके ठीक पीछे दो फर्लांग की दूरी पर मेरे हसीन ख्वाबों की झील है जिसमें तैराता हूं तुम्हारे नाम की नावें दुनिया से बेफिक्र होकर कुछ लोग इसे मेरा पालपन समझते हैं औऱ कुछ तुम्हें बदनाम करनें की साजिश लेकिन हैरान तो मैं इस पर हूं मेरे इस कारनामे को न तो पागलपन समझती हो ना ही कोई साजिश बस खड़ी हो उसी मसरूफियत के चौराहे पर जहां पहली बार मिले थे




पहली रोटी

आदिम मानव के मन में पहली बार रोटी बनाने का आईडिया आना कितना गजब रहा होगा | मुझे विश्वास है कि यह विचार किसी स्त्री का ही रहा होगा | वह बैठी होगी किसी रोज ..अकेली या अपने बच्चों के साथ गुफा में और बिजली की तरह कौंध उठा होगा रोटी का ख्याल ..| कितनी बार उसने अपनी अंगुलियां जलाई होंगी पहली रोटी सेंकने के चक्कर में | ...तब बनी होगी संसार की पहली रोटी ..| वह उछल पड़ी होगी रोटी को देखकर | शाम को जब पुरुष दिन भर की आखेट के बाद घर आया होगा और रोटी की महक नथुनों में गई होगी... तो रोम रोम तृप्त हो गया होगा उसका | उस रात वह खुले आसमान के नींचे चांद की रोशनी में - झांका होगा स्त्री की झील सी आंखों में, प्यार किया होगा, सहलाया होगा जली अंगुलियों को | लेकिन उस वक्त नहीं सोचा होगा उसने कि ...यही रोटी बनाने की कला कभी स्त्री होने की निशानी बन जाएगी| रोटी बनाना स्त्री होने जैसा है | आज की नहीं ..वह पहली रोटी बनाने वाली स्त्री जैसा | हमें लगता है रोटी उतनी ही गोल बनती है और अच्छी फूलती है ..बनाने वाले में स्त्रित्व जितना अधिक होता है | रोटी में ममत्व है, पोषण है, प्यार है, | स्त्री और रोटी एक दूसरे…