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स्त्री का अपरिवर्तनशील चेहरा हुसैन की 'गज गामिनी'

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स्त्री विमर्श पर फिल्में तो हजारों बन चुकी हैं | उनपर खूब लिखा भी गया है | लेकिन किसी पेंटर के नजरिए से फेमिनिज्म को बहुत कम पर्दे पर उतारा गया है। पिछले दिनों मकबूल फिदा हुसैन की गज गामिनी देखी | गज गामिनी मकबूल फिदा हुसैन की कविता और उसपर बनाई गई पेंटिंग है| जो कि पूरी तरह स्त्री को समर्पित है | हालांकि इसे सिर्फ स्त्री को किया गया ट्रिब्यूट कहना मकबूल के साथ न्याय न होगा | यह फिल्म स्त्री के अलग अलग समय को दर्शाने की ईमानदार कोशिश है जिसमे उसकी एक ही भूमिका है | वह हमेशा से पुरुषों की नजर में मां होती है, बहन, बेटी, प्रेमिका या सुंदरी ही होती है| नहीं होती तो इंसान।
 गज गामिनी ऐसी फिल्म है जिसमें न तो कोई हीरो है, न तो विलेन, बिना किसी प्लाट और स्क्रिप्ट के भी इन सबसे लैस है | यह फिल्म ऐसी स्त्री की कहानी है जिसके चेहरे और भूमिका को पुरुषों द्वारा गढ़ा गया है | उसके ये चेहरे समय से परे हैं | फिल्म में दो सदियों को एक काली दीवार के माध्यम से प्रदर्शित किया गया है | जिसके एक तरफ ज्ञान है ..जिसको कालिदास करते हैं और दूसरी तरफ मतलब दूसरी सदी साइंस ..जिसको की साइंटिस्ट।  पतझड़ के बाद बस…

#सूरत_डायरी-1

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मैं थोड़ी उमस और चिपचिपाहट भरे दिन में कमरे की फर्श पर लेटा हूं। बाहर धूप-छांव का खेल जारी है। ये जुलाई जब भी आती है, किताबें और पुराने झोले झाड़-पोछकर एक बार फिर स्कूल जाने का करने लगता है। हालांकि स्कूल की पढ़ाई से हमेशा छत्तीस का आंकड़ा रहा है। इस नॉस्टाल्जिया से बचने और समय बिताने के लिए मैं किताब के शरण में ..|
यह भी अजीब बात है। आज तक मैं समझ नहीं पाया कि किताब मेरे लिए टाइम पास है या नशा | एक खत्म कर दूसरी की जरूरत महसूस होने लगती है। खैर ...इस धूप-छांव वाले इस दिन में, जब बाहर से बहुत-धीमे-धीमे कौए या किसी गाड़ी के हॉर्न की आवाज भर आ रही है..बाकी सन्नाटा | मैं फ्रेंच पेट्रिक की किताब ' तिब्बत-तिब्बत' पढ़ते वक्त खूबसूरत लाल मिट्टी वाली भूमि पर काल्पनिक रूप से टहल रहा हूं। जिसे कॉमरेड माओ त्से तुंग जेडांग के लाल सैनिकों ने बराबरी लाने की सनक में खून से रंग दिया। हालांकि पेट्रिक लिखते हैं कि यह गुलाम तो 1720 में ही हो गया था। जब छठे लामा की हत्या के बाद सातवें लामा को पकड़कर कासंगी सम्राट ने पोटाला भेज दिया। और उनकी भूमिका महज काठ के उल्लू की रह गई।
पेट्रिक क…

अषाढ़ का एक दिन

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आसमान में काले-सफेद और सिल्की रंगत वाले बादल छाए हैं | इनके बीच से इक्का दुक्का पक्षी उड़ रहे हैं | सुबह आंख मीचते हुए उठकर बालकनी में आया तो समंदर की हवाओं ने माथा चूमकर इस्तकबाल किया |
ये मौसम देखकर बरबस ही कालिदास के मेघदूतम् की लाइन ..."ओ अषाढ़ के पहले बादल." फूट पड़ी | इसके आगे की लाइनें न तो याद हैं और न ही याद करने की कोशिश की कभी | दरअसल गाने या कविता की अगली लाइन याद न होना भी मजेदार होता है कई बार | मेरे जेहन में जब भी ये लाइन कुलबुलाती है ..तो कल्पना की भैंस खूंटा तुड़ाकर रोपनी के लिए तैयार किए जा रहे किसी खेत में पहुंच जाती है | वह पानी से लबालब भरे खेत में खुशी से लोटने लगती है |
अखबार लाया - पहली खबर पीएम इजरायल गए हैं | हथियारों की बड़ी डील हो सकती है | दूसरी चीन ने फिर से भारत को हड़काया | दूसरी जीएसटी..तीसरी ..रेप, चौथी क्रिकेट ...ब्ला ब्ला ब्ला | अंदर के किसी पन्ने पर मिली ..इतने किसानो ने की सुसाइड ... | अब कितनों ने सुसाइड की ..फर्क नहीं पड़ता | गिनती ही तो हैं | मैनें अखबार किनारे फेंका ..| आ गया फिर से फेसबुक पर | वहां भी ये वाद, वो वाद |…

गड़रिये का जीवन : सरदार पूर्ण सिंह

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आज फेसबुक स्क्रॉल करते वक्त रतनजीत सा की पोस्ट की हुई गड़रिये की यह तस्वीर दिख गई। इस तस्वीर से घर-गांव की कई स्मृतियां ताजी हो गईं। इसके बाद ग्रेजुएशन के दौरान पढ़ा गया सरदार पूर्ण सिंह का यह निबंध भी याद आ गया। इस पढ़कर गड़रिये बन जाने का मन करता है। बचपन में कई बार हम सब भेड़ें चराने के खूबसूरत सपने देखा करते थे। बारिस पहले जून महीने के आसपास खेतों में भेंड लेकर डेरा डालना और भउरी चोखा बनाना। तारों से भरे आसमान में सोना रोमांचित करता था। रंजीत सा को साभार, इस तस्वीर के लिए।
गड़रिये का जीवन- एक बार मैंने एक बुड्ढे गड़रिये को देखा। घना जंगल है। हरे-हरे वृक्षों के नीचे उसकी सफेद ऊन वाली भेड़ें अपना मुँह नीचे किए हुए कोमल-कोमल पत्तियाँ खा रही हैं। गड़रिया बैठा आकाश की ओर देख रहा है। ऊन कातता जाता है। उसकी आँखों में प्रेम-लाली छाई हुई है। वह निरोगता की पवित्र मदिरा से मस्त हो रहा है। बाल उसके सारे सुफेद हैं और क्यों न सुफेद हों? सुफेद भेड़ों का मालिक जो ठहरा। परंतु उसके कपोलों से लाली फूट रही है। बरफानी देशों में वह मानो विष्णु के समान क्षीरसागर में लेटा है। उसकी प्यारी स्त्री उसके पा…

सपनों को स्थगित करना

1902 में जन्में महान अमेरिकी अश्वेत लेखक लैंग्स्टन ह्यूज़ की लगभग लोकगीत बन चुकी कविता हार्लेम (Harlem) पढ़ने के बाद -

सपनों को स्थगित करना
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सपनों को स्थगित करना
होता है पुरानी चोट जैसा
ठीक न होने की निराशा में
जिसे जानबूझकर
भूल जाना चाहते हैं
यह सुबह का भूलना
शाम को लौटना होता है
भूलने और याद करने की
कश्मकश में सपने
पेंडुलम बने रहते हैं
सपनों को स्थगित करना
किसी रात भूखे पेट
सोने जैसा होता है
कई बार सिगरेट के
अमल जैसा कुछ
बस पा लेने का मन करता है
लेकिन हर बार दिमाग
चाहत के आवेग को
सुला देता है थपकी देकर
सपनों को स्थगित करना
कई बार जीने की इच्छाओं को
स्थगित करना भी होता है
सपने स्थगित करते करते
हम अपने आप से कितनी दूर
खिसक गए हैं ...नापना मु्श्किल है

देश और देशभक्ति के बीच

सामने हुए विभत्स
कत्ल को देखकर
नहीं कर सका कोई प्रतिरोध
चीखना चाहता था
लेकिन आवाज
अटक गई गले में कहीं
क्योंकि देश के नाम पर
की गई थी वो हत्याएं
और देशद्रोह सोचकर ही
कांप गई रूह मेरी


देश और देश भक्ति
पढने में भले हों महज दो शब्द
पर ये विचारों कर देते हैं 
ब्लैक एंड ह्वाइट
देश क्या है
देश में क्या क्या आता है
नहीं समझ पाया आज तक
लेकिन  डर लगता है  देशद्रोही होने से जैसे बचपन में लगता था  अब भी लगता है
घर के पास वाले तलाब से
उससे निकलने वाले भूतों से

बचपन में ही
रोप दिया गया था
देशद्रोह के भय का बीज
जो बन गया है अब बड़ा पेड़  इसकी छाया 
छीन लेती है गलत के खिलाफ  खड़े होने की शक्ति 
देश भक्ति और देश द्रोह
हत्यारों के लिए
ऐसे ही है
जैसे गुड़ के रस में
घोड़े को रम पिलाना 

देशभक्ति और देशद्रोह के बीच
खिंची है ऐसी अदृश्य रेखा
जो सोख लेती है
मानवता के सारे रंग, सारे रस
सिर्फ छोड़ती है
बंजर और शुष्क जमीन


दो प्रेम कविताएं ...

1
नहीं कहता तुम्हें मैं
गुलाब कली
भोर का तारा
या सांझ की लालिमा
तो कारण नहीं
कि दिल सूना है
या मेरा प्यार है धुंधला
बस केवल यही है :सारे उपमान
पड़ चुके हैं धुंधले
जैसे कपड़े घिस-घिस कर
छोड़ देते हैं रंग


मगर क्या तुम
नहीं पहचान पाओगे
अगर कहूं तुम्हें,
कास के फूल जैसा
या शरद की सुबह में
लहराती छरहरी
बजरे की बाली

सभ्यता के इस दौर में
जुही के फूल को भले ही
समझा जाता हो,
सौंदर्य का पैमाना
पर इससे अधिक
सच्चे- प्यारे प्रतीक हैं
कास के फूल
या शरद की सूनी सांझ
में डोलती बजरे बाली
(कुछ अधूरी लाइनें)
2

तुम्हें याद है,
जब हम मिले थे
आखिरी बार
तुम पलट कर
मुस्कराए थे
और मैनें बड़ी सफाई से
गीली आंखें छिपा ली थी
उसके ठीक पहले
हंसे थे हम दोनों
आखिरी बार एक साथ
वह हंसी उठी थी
नाभि के हिस्से से
और निकल गूंज गई
हमारे साथ हंसी थी सड़कें
और फुटपाथ भी
पर वे हंस रहे थे
हमारी नियति पर
उन्हें भी पता था
कि इन बावरों की हंसी
बस आज भर है
तुम्हें याद है या भूल गए
भूल गए हो तो अच्छा ही है
जरूरी नहीं दोनों उस
हंसीन मौसम के
इंतजार में कर दें
उम्र तमाम
तुम हंसो
मैं रोने का तुम्हारा औसत भी
पूरा करता हूं
(अधूरी लाइनें .)